रास्ता अपना

Sunday, 1 February 2015

जैसे को तैसा

                वन में दो गौरैये थे|सब कुछ अच्छा भला चल रहा था,एक दिन मादा गौरैया ने अण्डे दिये उसी दिन दोपहर की चिलचिलाती धूप में एक गजराज ऊधर से गुजरा उसे गौरैये की चहचहाना अच्छा जंचा तो वह पेड़ के नीचे आराम करने खड़ा हुआ|चूंकि धूप से उसकी हालत पतली हो रही थी सो वह गुस्से में घोंसले को ही खिंच कर  गिरा दिया|इससे नन्ही मादा गौरैया बहुत आहत हुई|उसने अपनी दु:ख अपनी सहेली मक्खि से साझा किया और गजराज को मजा चखाने की तरकीब सोचने लगे|साम ढल गया तो मक्खि ने कहा-मेरी मेघनाद नामक मेंढक से दोस्ती है तो कल उससे मिलकर कुछ योजना बनाते हैं अब वे घर वापस हो गये|गौरैये ने दाना चुगना भी छोड़ दिया|
              सबेरे-सबेरे वे दोनों मेंढक से मिले और अपनी दू:ख बताया|मेंढक थोड़ा सोचने के बाद उन्हें निर्देश देते हुए कहा-हमें फौरन मेरे दोस्त कठफोड़वा के घर चलना चाहिए,बाकि बातें मैं वहीं बताऊंगा|
अब वे तेजी से कठफोड़वा के घर को चलने लगे|बिलखती गौरैया और तेजी से रोने लगी|अब वे कठफोड़वा के घर पहुंचे|
मेहमान नवाजी के बाद कठफोड़वा ने मेंढक से ऐसे औचक आने का कारण पूछा|मेंढक उसे समझाने के बाद अपनी योजना बताया-दोपहर को वह थका हारा हाथी पेड़ की छांव में आराम करने आएगा तो तनम-मक्खि उसके कान के पास मधूर तराने निकालना जिससे गज को नींद आ जाए|इतने में कठफोड़वा उसकी आंखो को फोड़ देगा|मैं गहरी खाई की तरफ अपने परिवार को लेकर टर्राने लगूंगा जिससे उस गज को पानी प्यास लगने पर ऊधर पानी होने का भ्रम हो और वह खाई में गिर जाए|
                 अब वे योजना को अमलीजामा पहनाने को तैयार हो गये|दोपहर हुई गज पेड़ के नीचे आराम करने पहुंचा|मक्खि ने उसके कान पर मधूर तराने गाकर उसे सुला दिया|बारी बारी कठफोड़वा की आई तो ऊन्होंने एक-एक कर गज की दोंनों ही आँखें फोड़ दी|जब गज को प्यास लगी तो वह मेंढक की टर्राने को सुन उधर ही गया जिधर खाई था|बाकि क्या हुआ होगा ए तो बच्चा-बच्चा जानता है|अब सभी मित्रों ने योजना के मुताबिक कार्य सफल होने की बधाईयाँ दी और चल पड़े|
मेरे साथ जुड़े रहने के लिए आपका मैं आभारी हुँ|प्लीज कुछ वक्त देकर कमेंट करें यह मेरे लिए  stimulus होगा|

Source: theme of these story is acquired from ",पंचतंत्र की कहानिंयां"

SAVE CHILD

"आज के बच्चे कल के नेता,
यही हमारे भाग्य निर्धाता"

Friday, 30 January 2015

सियार की होशियारी

      यह कथा किवंदितीयों पर आधारित है भले आज हम सब न्यूक्लियर फैमिली जेनरेशन के लोग हैं अपितु कभी-न-कभी तो हमने अपने दादा-दादी,नाना-नानी से कहानी सुनी ही है बस वही कहानी मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ|
              नंदनवन में एक गोमु नामक सियार रहता था|वह एक दिन भूख-प्यास से बेहाल हो कर इधर-उधर इस बात की टोह में भटक रहा था कि कहीं कुछ मिले तो अपना पेट भरे|भटकता हुआ वह जंगल के ऐसे भाग में पहुंचा जहां कुछ समय पहले युध्द हुई थी|वहां पर कुछ खांच-खरोच के अलावा एक नगाड़ा उसे पास की झाड़ी पर दिखा|उस वक्त शनै:शनै: हवा चल रही थी जिससे झाड़ी की टहनियां बार-बार नगाड़े से टकरातीं जिससे वह बजने लगता|नजदीक पहुंचते यह विचित्र आवाज बार -बार सुनाई देता|ऐसी आवाज उसने आज पहली दफा सुनी थी|वह मारे भय के कांपने लगा और ठिठक कर खड़े होकर सोचने लगा जानवर की आवाज तो इतनी तेज है फिर जानवर तो भयानक होगा और देखते ही खा जायेगा|वह सोचता रहा कि अब झपट्टा मारे की तब|उसे सूझ नहीं रहा था कि आखिर करे तो क्या करे?उसके मन में विचान आया कि वह दूबक कर निकल ले और प्राण बचने कि खैर मनाऐ|
            वह भागने कि सोच ही रहा था कि उसके मन में विचार आया कि किसी संकट का आभास पाकर झट भाग खड़े होने में होसियारी नहीं है|इसकी छानबीन अवश्य कर लेनी चाहिए|क्योंकि,भय या हर्ष में जो सोच सकता है उसे पछताना तो नहीं पड़ता|
             यह विचार आने पर वह ठान लिया कि वह पता लगाय़ेगा कि आवाज कहां से आ रही है!जी रोक कर वह दबे पांव से नगाड़े की ओर बढ़ा|ध्यान से देखा तो आवाज नगाड़े से आ रही थी|उसकी हिम्मत बढ़ गई वह उसके और समीप पहुंचा|अब उसे कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी|फिर क्या वर जान हथेली पर रखकर अपना एक हाथ उस पर जमा लिया|थाप लगने से वही आवाज आई|अब डर नहीं रहा|इतना मोटा व गदराया हुआ जानवर उसकी आगोस में था|जिभ लपलपा कर कहने लगा आज तो जी भर खून पियेगा|
            उसने जैसे-तैसे उस नगाड़े के चमड़े को काट कर छेद बनाया|चमड़ा मोटा और सूखा तो था ही,तना हुआ भी था,इसलिए उसे जोर लगाना पड़ रहा था|अब वह खोल के अंदर इस उम्मीद से घुसा कि अब तो मजे से खायेगा पर ये क्या वह तो फंस गया और चिल्लाने लगा|यह शोर सुन एक शेर पहुंचा और उसका शिकार कर लिया|

Sunday, 18 January 2015

विवेकवाणी 001

   

     रास्ता अपना बनाओ,उसे अपनाओ
        विवेक खेस्स

Saturday, 17 January 2015

एक सलामी-सलामत रहने के लिए

             हर बार की तरह इस बार भी मैं आपबीती लेकर आपके सामने हाजिर हूँ|जीवन मैं कई ऐसे उलझनें मौजूद हैं जिनके पीछे की सच्चाई तलाशना नामुमकीन तो नहीं कहुंगा लेकिन टेढ़ी खीर साबित होती अवश्य लगती है इसमें कोई दो राय नहीं|खैर जो भी हो मैं इस वक्त एक अनसुलझी/रहस्य आपसे शेयर कर रहा हुँ|
                      मैं शाम 6:00 बजे की बस द्वारा अंबिकापुर से बगीचा आ रहा था|बस में Rush की वजह से मुझे cabin की seat मिली|बस छूटने के करीब आधे-पौन घंटे में बस पहाड़ी तक पहुंची|ठंड की मौसम की वजह से सड़क पर काफी सन्नाटा पसरा था|यकीन नहीं हो रहा था कि नेशनल हाईवे पर ट्रैवल कर रहे थे खैर जो भी हो अब आगे बताता हुँ cabin seat पर बैठने की वजह से मैं सामने स्पष्ट तौर पर देख सक रहा था|बस जंगल से होकर गुजरने लगी कि तभी अचानक से हमारी बांयी तरफ से बिल्ली ने बस को क्रोस किया|

ड्राईवर ने तुरंत ही बस रोक दी और बस में light के लिए जलते सारे बल्ब्स ओफ कर दिये और बस भी एक ही झटके में ही रोक दी|  मुझसे ऐसा होना रहा नहीं गया पर मैंने खुद को रोका ,कुछ देर बाद बगल की सीट वाले से कहा-आपने वो सब देखा?
जवाब-हाँ!!बस ऐसे किया जाता है|
अब बस कुछ देर में आगे चल पड़ी|मैं संतोषप्रद जवाब चाहता था सो मैंने घर पहुंचकर पापा से पूछने का मन बना लिया|इतने में एक दूसरी बिल्ली बस को क्रॉस कर गई,इस बार भी ड्राईवर ने वही किया जो last incident में किया था बस इस बार बिल्ली छोटी थी और हमारी बांयी ओर से उसने हमें क्रॉस किया|
                 
घर पहुंचने के बाद मैंने पापा से पूछा यहां भी पहले जैसा ही जवाब मिला|
कारण जो भी पर पापा ने बताया कि ड्राईवर्स  में मान्यता है कि वो लोग सेफ्टी को ध्यान में रखकर ऐसा करते हैं|मैं तो ईस incident को सलामत रहने के लिए एक सलामी कहता हुँ|इस बारे अपनी राय मुझे कमेंट द्वारा दे सकते हैं बेहिचक...
      "रास्ता अपना बनाओ,उसे अपनाओ"
                   विवेक खेस्स

विवेकवाणी